राजमहल-गंगा क्षेत्र की भू-विविधता का होगा वैज्ञानिक आकलन, ‘जियो-राजमहल’ परियोजना को मंजूरी
परियोजना को मंजूरी

राजमहल-गंगा क्षेत्र की भू-विविधता का होगा वैज्ञानिक आकलन, ‘जियो-राजमहल’ परियोजना को मंजूरी
रिपोर्टर – उज्जवल कुमार साहा
साहिबगंज। राजमहल की पहाड़ियों, गंगा नदी प्रणाली, जैव विविधता, जीवाश्म संपदा और पुरातात्विक विरासत के वैज्ञानिक अध्ययन एवं संरक्षण की दिशा में साहिबगंज जिले को बड़ी उपलब्धि मिली है। झारखंड सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत झारखंड विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार परिषद (JCSTI) ने बहुविषयक शोध परियोजना ‘जियो-राजमहल (GEO-RAJMAHAL)’ को मंजूरी दी है। परियोजना का संचालन 36 महीनों में चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।
परियोजना के प्रधान अन्वेषक (PI) आईआईटी (आईएसएम), धनबाद के अनुप्रयुक्त भूविज्ञान विभाग के प्रो. दीपक कुमार झा हैं। वहीं साहिबगंज कॉलेज, सिद्धो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका के भूविज्ञान विभाग के भू-वैज्ञानिक सह पर्यावरणविद् डॉ. रणजीत कुमार सिंह सह-प्रधान अन्वेषक (Co-PI) की भूमिका निभाएंगे। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), रांची की वरिष्ठ भूवैज्ञानिक सुश्री श्रेया श्रेय भी परियोजना में महत्वपूर्ण सहयोग करेंगी।
साहिबगंज कॉलेज के लिए बड़ी उपलब्धि
‘जियो-राजमहल’ परियोजना को साहिबगंज जिले और साहिबगंज कॉलेज के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। भू-विज्ञान के क्षेत्र में जिले और कॉलेज से जुड़ी यह पहली महत्वपूर्ण शोध परियोजना है। परियोजना में डॉ. रणजीत कुमार सिंह की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर भू-विरासत, पर्यावरण और जैव विविधता से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
डॉ. सिंह लंबे समय से राजमहल पहाड़ियों की भूगर्भीय विरासत, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक अध्ययन से जुड़े रहे हैं। राजमहल क्षेत्र की भू-विरासत और पर्यावरणीय महत्व से संबंधित उनके शोध कार्य भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुके हैं।
जीवाश्म संपदा का होगा वैज्ञानिक अध्ययन
राजमहल की पहाड़ियां अपनी समृद्ध भूगर्भीय विरासत और दुर्लभ जीवाश्मों के लिए विशेष पहचान रखती हैं। क्षेत्र में क्रिटेशियस युगीन पादप जीवाश्म, जीवाश्मीकृत लकड़ी तथा करोड़ों वर्ष पुराने पादप पत्तों के जीवाश्म छाप पाए गए हैं।
साहिबगंज के मंडरो प्रखंड में जीवाश्मों की विविधता और संख्या को देखते हुए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने वर्ष 2014 में इसे भू-विरासत स्थल (Geological Heritage Site) के रूप में मान्यता दी थी। जीवाश्मों के संरक्षण के उद्देश्य से झारखंड सरकार के वन विभाग द्वारा वर्ष 2022 में मंडरो में फॉसिल पार्क का निर्माण भी कराया गया।
भूविज्ञान, पारिस्थितिकी और भू-पुरातत्व पर रहेगा जोर
परियोजना के तहत राजमहल क्षेत्र में भूविज्ञान, पारिस्थितिकी और भू-पुरातत्व से संबंधित वैज्ञानिक जानकारी एकत्र की जाएगी। शोध के माध्यम से क्षेत्र की प्राचीन प्राकृतिक परिस्थितियों और मानव-पर्यावरण संबंधों को समझने का प्रयास किया जाएगा।
प्रागैतिहासिक काल में क्षेत्र में रहने वाली जनजातियों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों का भी अध्ययन किया जाएगा। इसके साथ ही गंगा पारिस्थितिकी तंत्र और राजमहल पहाड़ियों की जैव विविधता को प्रभावित करने वाले अजैविक कारकों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा।
भू-पर्यटन और रोजगार की संभावनाओं को मिलेगा बढ़ावा
परियोजना का उद्देश्य केवल वैज्ञानिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। शोध के माध्यम से राजमहल की भू-विरासत के संरक्षण, स्थानीय समुदाय की आर्थिक भागीदारी, रोजगार के अवसर और भू-पर्यटन (Geo-tourism) को बढ़ावा देने की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाएगा।
परियोजना से प्राप्त वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर क्षेत्र के लिए स्थल-संवेदनशील एवं टिकाऊ संरक्षण और विकास नीतियां तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही राजमहल क्षेत्र की प्राकृतिक, भूगर्भीय और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में भी यह परियोजना अहम भूमिका निभा सकती है।
‘जियो-राजमहल’ परियोजना को राजमहल-गंगा क्षेत्र की अद्वितीय भू-विरासत, जैव विविधता और सांस्कृतिक-पुरातात्विक संपदा के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।



